रविवार, 30 अक्टूबर 2011

मेरा प्रापर्टी-1 से है, आपके सपनों के घर क़ा रास्ता...


"घर सजाने क़ा तसव्वुर तो बहुत बाद क़ा है,
पहले ये तो तय हो, घर को बचाएं कैसे"

सचमुच अपना एक सुन्दर-सा घर बनाने और उसे सजाने क़ा सपना तो हर इंसान के दिल में उसी दिन से रहता है, जब वो बचपन में रेट और मिट्टी के साथ खेलते हुए घरौंदा बनता है.
लेकिन खेल-खेल में बनाये गए घरौंदे और वास्तव में तैयार किये गए घर में जमीन औरआसमान क़ा फर्क होता है. आज की कमर-तोड़ महंगाई में छोटा सा घर बनाना भी किसी सपने से कम नही है. और जब किसी तरह बैंक से कर्ज लेकर, मित्रों से मदद लेकर या सरकार की किसी योजना क़ा लाभ लेकर एक घर अपने नाम पर हो जाता है, तो हमारी ख़ुशी क़ा कोई ठिकाना नहीं रहता. आज के हालात जैसे हैं, उसमे तो यही लगता है कि कोई भी शख्स अपनी जिंदगी में एक घर ही बना ले, तो ये भी अपने आप में किसी उपलब्धि से कम नहीं है. लेकिन भौतिक प्रगति यानी बाहरी तरक्की के आज के दौर में इंसान पहले से ज्यादा असुरक्षित भी महसूस करने लगा है. तभी बहुत से लोग अपना घर बनाने के साथ दूसरों के घर उजाड़ने के बारे में सोचने लगे हैं. आतंकवाद, हिंसा और दंगों में हम अक्सर देखते हैं कि कैसे पूरी बस्तिया उजाड़ डी जाती हैं. कितने अफ़सोस की बात है कि -
" लोग टूट जाते हैं, एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में "
इस बेरहम हालात के बावजूद अभी भी ऐसे लोगो कि तादाद कहीं ज्यादा है. जो दूसरों के घर बनाने में जुटे हुए हैं. जाहिर हैं कि ऐसे ही उदार-मन और रहम-दिल इंसानों बदौलत ये समाज अपनी ऊर्जा के साथ आगे बढ़ रहा है. और जब तक ये ऊर्जा बनी रहेगी, हम सब कुछ-न-कुछ रचनात्मक कार्य करने के लिए प्रेरित भी होते रहेंगे.
चाहे, अपना घर बनाने की ख्वाहिश हो, या फिर किसी और क़ा घर बचाने की तमन्ना- इतना तो तय है कि ये दोनों ही जज्बे बेहद ख़ास हैं. और, हर इंसान को अपनी धड़कन के साथ यदि पूरी शिद्दत से जीना है तो इसके लिए इन दोनों मे से कोई न कोई काम करते रहना चाहिए.
तकलीफ के वक्त में, किसी और क़ा घर बचाने क़ा सुकून तो आप भी जानते होंगे. ये सुकून तो हम सबकी जिंदगी को रौशन करता है. लेकिन, जहाँ तक अपना घर बनाने की ख्वाहिश की बात है, तो इसके लिए बहुत कुछ करना पड़ता है. सबसे पहले तो पैसे क़ा इंतजाम. फिर जमीन क़ा एक छोटा सा टुकड़ा. इन दोनों के मिल जाने पर, चाहिए- अपने सपनों के घर को कागज पर उतारने क़ा हुनर. यहीं से हम आपके साथ हो लेते हैं. यानी मेरा प्रापर्टी-1. सच तो ये है कि हम आपको पैसे के इंतजाम और जमीन हासिल करने में भी मदद करना चाहते है. बस आप इस पत्रिका- मेरा प्रापर्टी-1 के पन्नों को आहिस्ता-आहिस्ता पलटते जाइये.
हमारी ये छोटी सी कोशिश आपको जैसी भी लगे, आप अपने सुझाव हमें जरुर दीजियेगा क्योंकि आपके कीमती सुझावों से ही ये पत्रिका आगे और भी निखरती जाएगी.
हमने फिलहाल सिर्फ भविष्य में बनने वाले आपके सपनों के घर को अपनी खुली नजर से देखने की ईमानदार कोशिश की है. इस कोशिश को मंजिल तक पहुंचाने में आप ही होंगे हमारे साथ और होगी आपकी अपनी नजर .
" ये तेरा घर, ये मेरा घर, किसी को देखना हो गर
तो पहले आके मांग ले मेरी नजर, तेरी नजर"
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विभाष कुमार झा
संपादक

अँधेरे में जो बैठे हैं, नज़र उन पर भी कुछ डालो


* विभाष कुमार झा

महात्मा गाँधी ने देश के धनपतियों से कहा था कि अपनी औद्योगिक और पारिवारिक जरूरतों की पूर्ति होने के बाद अमीरों को अपने बाकी धन के सामाजिक इस्तेमाल के लिए एक ट्रस्ट (न्यास) बनाना चाहिए. इस धन क़ा इस्तेमाल असहाय और गरीबों की मदद के लिए करना चाहिए. दुर्भाग्य है कि आज हम देश के विकास की चर्चा जब भी करते है तो पाते है कि जिस अनुपात में देश की भौतिक और आद्योगिक प्रगति हुई है उसी अनुपात में देश के भीतर आर्थिक असमानता भी बढ़ी है.
जो अमीर थे वे और अमीर हो गए, और जो गरीब थे, वे और भी गरीब होते गए. आश्चर्य ये है कि विकास की रफ़्तार बढ़ने के साथ साथ अमीर और गरीब के बीच की खाई भी और बढ़ चुकी है. देश के मौजूदा औद्योगिक परिदृश्य को देखते हुए ये कहा जा सकता है कि अधिकांश उद्योगपतियों ने महात्मा गाँधी की सलाह को किनारे करते हुए केवल अपनी तरक्की को ही अंतिम मान लिया है. कहीं- कहीं ऐसा भी देखने को मिलता है कि व्यापारिक वर्ग ने अपने सामाजिक दायित्व के कार्यों क़ा प्रचार करने में ज्यादा खर्च किया है और वास्तव में समाज कार्य में कम खर्च किया. इस बीच समाज क़ा नेतृत्व करने वाला वर्ग भी अपने कार्यो और फैसलों से यह साबित करने में नाकाम रहा है वो समाज के कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशील है.
राजनीतिक आयोजन में करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाने वाले राजनीतिक दल और उनकी सरकारें अपने कर्मचारियों की तनख्वाह भी एक साल में पांच सौ रुपये तभी बढाते हैं, जब इसके लिए कर्मचारी अनशन करते हैं. क्या आपको नहीं लगता कि हमारे बहुत से दल और उनकी सरकारें इस बात से अंजान हैं कि भारत के संविधान के अनुसार- "भारत एक लोकतंत्रात्मक समाजवादी और लोक कल्याणकारी राज्य है." इस तरह अहन कि सभी सरकारों को अपने ताम-झाम कम से कम रखते हुए जनता के टैक्स से प्राप्त धन क़ा ज्यादा से ज्यादा हिस्सा जनता के कल्याण के लिए ही खर्च करना चाहिए
जनता को अब जागना ही होगा कि उसके टैक्स के पैसे क़ा इस्तेमाल उसके कल्याण के लिए ही होना चाहिए. जब तक जनता अपने इस अधिकार को नही जानेगी, तब तक उद्योग जगत और शासन वर्ग जनता के प्रति सच्चे अर्थों में जवाबदेह नहीं बन पायेगा. इस परिवर्तन के बाद ही विकास क़ा सही स्वरुप हमें समाज में दिखाई देने लगेगा. -शायद ऐसे ही समय में शासक वर्ग को सचेत करने के लिए साहिर लुधियानवी ने लिखा था-

"अँधेरे में जो बैठे हैं, नज़र उन पर भी कुछ डालो
अरे ओ रौशनी वालों , अरे ओ रौशनी वालों" .
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