रविवार, 30 अक्टूबर 2011

अँधेरे में जो बैठे हैं, नज़र उन पर भी कुछ डालो


* विभाष कुमार झा

महात्मा गाँधी ने देश के धनपतियों से कहा था कि अपनी औद्योगिक और पारिवारिक जरूरतों की पूर्ति होने के बाद अमीरों को अपने बाकी धन के सामाजिक इस्तेमाल के लिए एक ट्रस्ट (न्यास) बनाना चाहिए. इस धन क़ा इस्तेमाल असहाय और गरीबों की मदद के लिए करना चाहिए. दुर्भाग्य है कि आज हम देश के विकास की चर्चा जब भी करते है तो पाते है कि जिस अनुपात में देश की भौतिक और आद्योगिक प्रगति हुई है उसी अनुपात में देश के भीतर आर्थिक असमानता भी बढ़ी है.
जो अमीर थे वे और अमीर हो गए, और जो गरीब थे, वे और भी गरीब होते गए. आश्चर्य ये है कि विकास की रफ़्तार बढ़ने के साथ साथ अमीर और गरीब के बीच की खाई भी और बढ़ चुकी है. देश के मौजूदा औद्योगिक परिदृश्य को देखते हुए ये कहा जा सकता है कि अधिकांश उद्योगपतियों ने महात्मा गाँधी की सलाह को किनारे करते हुए केवल अपनी तरक्की को ही अंतिम मान लिया है. कहीं- कहीं ऐसा भी देखने को मिलता है कि व्यापारिक वर्ग ने अपने सामाजिक दायित्व के कार्यों क़ा प्रचार करने में ज्यादा खर्च किया है और वास्तव में समाज कार्य में कम खर्च किया. इस बीच समाज क़ा नेतृत्व करने वाला वर्ग भी अपने कार्यो और फैसलों से यह साबित करने में नाकाम रहा है वो समाज के कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशील है.
राजनीतिक आयोजन में करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाने वाले राजनीतिक दल और उनकी सरकारें अपने कर्मचारियों की तनख्वाह भी एक साल में पांच सौ रुपये तभी बढाते हैं, जब इसके लिए कर्मचारी अनशन करते हैं. क्या आपको नहीं लगता कि हमारे बहुत से दल और उनकी सरकारें इस बात से अंजान हैं कि भारत के संविधान के अनुसार- "भारत एक लोकतंत्रात्मक समाजवादी और लोक कल्याणकारी राज्य है." इस तरह अहन कि सभी सरकारों को अपने ताम-झाम कम से कम रखते हुए जनता के टैक्स से प्राप्त धन क़ा ज्यादा से ज्यादा हिस्सा जनता के कल्याण के लिए ही खर्च करना चाहिए
जनता को अब जागना ही होगा कि उसके टैक्स के पैसे क़ा इस्तेमाल उसके कल्याण के लिए ही होना चाहिए. जब तक जनता अपने इस अधिकार को नही जानेगी, तब तक उद्योग जगत और शासन वर्ग जनता के प्रति सच्चे अर्थों में जवाबदेह नहीं बन पायेगा. इस परिवर्तन के बाद ही विकास क़ा सही स्वरुप हमें समाज में दिखाई देने लगेगा. -शायद ऐसे ही समय में शासक वर्ग को सचेत करने के लिए साहिर लुधियानवी ने लिखा था-

"अँधेरे में जो बैठे हैं, नज़र उन पर भी कुछ डालो
अरे ओ रौशनी वालों , अरे ओ रौशनी वालों" .
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