मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

किसान और कृषि के सहारे तीसरी पारी की तैयारी

कृषि बजट अलग से बनाएगी रमन सरकार

किसान और कृषि के सहारे तीसरी पारी की तैयारी



= विभाष कुमार झा
छत्तीसगढ़ में रमन सरकार की दूसरी पारी के तीन वर्ष हो चुके हैं. अब सरकार को अगले चुनाव की चिंता सताने लगी है, जो स्वाभाविक भी है. राजनीतिक दलों को जो भी समाज कल्याण करना होता है, वे इसे सत्ता के सहारे ही करते हैं. संसदीय राजनीति का यही तौर-तरीका भी है, चुनाव से पहले जनता को खुश करने के लिए सभी राजनीतिक दल तरह तरह की कोशिशें करते हैं.
पिछली बार रमन सरकार ने दो रुपये किलो की दर से हर गरीब परिवार को एक महीने में 35 किलो चावल देकर चुनाव के नतीजे अपने पक्ष में कर लिए थे. भाजपा सरकार के उस पहले कार्यकाल के चौथे वर्ष में जनवरी के महीने में यह महत्वाकांक्षी योजना शुरू की गई थी. यह अलग बात है कि बाद में सस्ते चावल वाली योजना के कुछ नकारात्मक पहलू भी उजागर हुए. इससे मुफ्त शराबखोरी और मजदूरी नहीं करने की अलाली भी देखने को मिली. इसे कांग्रेस ने मुद्दा भी बनाया. लेकिन वह योजना उस समय चुनाव जीतने में कितनी कारगर हुई- यह जानना हो, तो उस समय के कांग्रेस के घोषणा पत्र' को भी देखना चाहिए. चूँकि यह योजना चुनाव से एक वर्ष पहले ही शुरू हो चुकी थी, और इसका प्रभाव भी सत्ताधारी दल के पक्ष में पहले से दिखाई देने लगा था. इसे ध्यान में रखकर ही, कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में भाजपा की उस योजना के जवाब में, सत्ता में आने पर एक रुपये किलो चावल देने का ऐलान कर दिया था.
जहाँ तक इस बार के विधानसभा चुनाव का सवाल है, तो इस मुहावरे को सभी दलों को ध्यान में रखना होगा कि 'काठ ही हांडी एक बार ही चढ़ती है'. राजनीतिक दलों के योजनाकार और रणनीतिकार भी इन बातों को किसी और विशेषग्य से ज्यादा अच्छी तरह समझते हैं. इसीलिए इस बार भाजपा ने अपने चुनावी वर्ष में प्रवेश करने से पहले ही दूरगामी सकारात्मक योजना का सहारा लिया है. अच्छा यह है कि रमन सरकार ने वास्तव में विकास को मुद्दा बनाने की ठानी है. लोकतंत्र के लिए यह वास्तव में एक शुभ संकेत है कि सत्ताधारी दल अपने विकास कार्यों को ही जनता के बीच ले जाकर समर्थन मांगे.
रमन सरकार इस बार कृषि का बजट अलग से बनाने जा रही है. तकनीकी रूप से भले ही यह आम बजट से अलग हो या उसी के साथ पेश हो, लेकिन इस सम्बन्ध में घोषणा करके भाजपा सरकार ने इतना तो स्पष्ट कर दिया है कि इसबार किसानों के लिए बड़े लाभ की घोषणा की जा सकती है. एक बड़ी सम्भावना तो इस बात की है की राज्य में किसानों को अब तीन प्रतिशत की बजाय केवल एक प्रतिशत ब्याज पर कर्ज मिल सकता है. याद रहे कि छत्तीसगढ़ ऐसा पहला राज्य है जहाँ कृषि सम्बन्धी कर्ज को 16 प्रतिशत ब्याज से कम करके तीन प्रतिशत ब्याज कर दिया गया था. अब इसे और भी कम, यानि लगभग 'नहीं' के बराबर किया जा सकता है.
इसी तरह धान खरीदी में तमान शिकायतों के बावजूद किसानों को सीधे उनके खाते में भुगतान और अच्छी कीमत देकर राज्य सरकार ने किसानों की आर्थिक समस्या को काफी हद तक हल किया है. दूसरे राज्यों से धान लाकर यहाँ बेचना और दलालों को पहले से बेच देना- यह सब किसी किसान की व्यक्तिगत गड़बड़ी हो सकती है. लेकिन व्यवस्था की चुस्ती ने अब गड़बड़ी को कम कर दिया है. सच तो यह है की प्रदेश सरकार की धान खरीदी और सार्वजनिक वितरण प्रणाली की सराहना स्वयं केंद्रकी कांग्रेस गठबंधन सरकार ने भी की है. रमन सरकार के लिए ऐसे कम से कम पांच बड़े प्रयास हैं. जिन्हें केंद्र सरकार ने न केवल पसंद किया है, बल्कि यहाँ की व्यवस्था को अन्य राज्यों में जस-का- तस लागू करे की सिफारिश भी की है.
कृषि बजट भी इस समय देश के केवल तीन राज्यों में लागू है. छत्तीसगढ़ में साथ प्रतिशत उद्योग और राजस्व कृषि आधारित है. इसलिए यहाँ कृषि बजट अलग से बनाकर किसानों के लिए समय-बढ प्रयास करने की पहल वास्तव में किसानों की आर्थिक स्थिति को बेहतर बना सकती है. यदि इस बजट में शामिल योजनाओं को गंभीरता से लागू किया जाता है, तो निश्चित रूप से राज्य सरकार को सत्ता की तीसरी पारी के लिए इसका लाभ मिलेगा. इसे सत्ता में रहने का अतिरिक्त लाभ (एडवांटेज) भी कह सकते हैं.
कृषि बजट की सफलता इस बार पर भी निर्भर करती है कि इससे स्वयं किसान कितने संतुष्ट होते हैं. इसके साथ-साथ राज्य सरकार को एक बात का ध्यान खास तौर पर रखना होगा कि कम वर्षा वाले क्षेत्रों में यदि नए बांध और एनीकट बनाए जाते हैं, तो उस एनीकट का पूरा-पूरा लाभ किसानों को ही मिले दिया जाये. वरना, अभी की स्थिति में यह आरोप अक्सर लगते हैं कि सरकार ने भले ही छोटी-बड़ी नदियों पर बहुत से एनीकट बनाए है, लेकिन उनके स्थान को तय करते समय आस-पास लगने वाले कारखानों को ही ध्यान में रखा गया था. इन एनीकट से ज्यादातर पानी उद्योगों को मिल रहा है, किसानों या ग्रामीणों को निस्तारी के लिए बहुत से इलाकों में अभी भी समस्या का सामना करना पड़ता है.
कृषि बजट, बेशक भाजपा को फिर से सत्ता में ला सकता है, लेकिन तभी जब इसमें किसानों को अपना लाभ साफ़ तौर पर दिखाई दे. एक तथ्य यह भी है कि देश के किसानों तथा ग्रामीणों को नासमझ मानना किसी भी राजनीतिक दल के लिए भारी भूल साबित हो सकती है.
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मंगलवार, 17 जनवरी 2012

नए जिलों से खुलेंगे तरक्की के रास्ते


-- विभाष कुमार झा
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राज्य सरकार ने विकास के लिए अब तक जो भी प्रयास किये हैं, उनमें विकेंद्री कारण की दस्तक हमेशा सुनाई दी है. इसी कड़ी में नौ नए जिलों क़ा गठन भी एक क्रांतिकारी कदम साबित होगा. विकास के लिए छोटे से छोटे इलाके को भी अपने प्रशासन के नजदीक पहुँचने क़ा अह्साद दिलाना बहुत बड़ा फैसला है.
बेशक अपनी स्थापने के मात्र 11 वर्ष की अवधि में छत्तीसगढ़ ने अनेक क्षेत्रों में जो ऐतिहासिक एवं यादगार उपलब्धियाँ हासिल की है वह काबिले तारीफ है. छत्तीसगढ़ ने इस अवधि में राज्य में अधोसंरचना विकास, आर्थिक तथा सामाजिक विकास जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अपनी विशेष पहचान बनाई है. इस दौरान शहर से गांव तक सभी के लिए विकास के साधन उपलब्ध हुये हैं. आर्थिक विकास से लोगों की आय बढ़ने के साथ रहन-सहन और जीवन स्तर में भी बड़ा अंतर आया है।
वास्तव में छत्तीसगढ़ ने 11 साल के अंतराल में विकास की जो नयी परिभाषा गढ़ी है वह अन्य राज्यों के लिये प्ररेणादायक रही है । चाहे खेती-किसानी की बात हो या शिक्षा, या फिर ग्रामीण राज्य के बहुत से कार्य देश भर में एक नया कीर्तिमान बनकर उभरे हैं.
छत्तीसगढ़ के प्राय: सभी जिलों का क्षेत्रफल वृहद होने के साथ विषम भौगोलिक संरचना के थे जिसके कारण आम जनता को अपने छोटे से कार्य के लिये लंबी दूरी तय कर जिला मुख्यालय तक पंहुचना पड़ता था। लोगों की इन्ही कठिनाइयों को दूर करने के लिये बड़े जिलों को विभाजित कर नये जिलों क़ा गठन करना तय किया गया.

सरकार के स्तर पर बार बार यह महसूस किया गया कि केवल मुख्यमंत्री के राजधानी स्थित निवास पर जनदर्शन आतोजित करने के अलावा वर्ष में एक बार एक महीने का ग्राम सुराज अभियान चलाकर लोगों की दिककतो को हल करने का कारगर प्रयास करते रहे। बड़े जिलों की प्रशासनिक स्थिति को समझते हुए यह देखा गया कि ग्राम सुराज अभियान भी आम जनता की आवश्यकताओ का त्वरित समाधान करने में उतना कारगार साबित नही हो पा रहा, जितना राज्य के मुखिया चाहते थे. तभी से नए जिले बनाने की कवायद तेज होने लगी. ये नौ जिले राज्य की तरक्की को उस मंजिल तक पहुचाने में मददगार होंगे तथा छत्तीसगढ़ एक विकसित राज्य के रूप में स्थापित होने कि दिशा में अग्रसर होगा.
इन नौ नए जिलों में बलौदाबाजार, बालोद, बलरामपुर, बेमेतरा, गरियाबंद, मुंगेली, सूरजपुर, कोण्डागाव और सुकमा शामिल हैं. इस तरह अब राज्य में जिलों की संख्या 18 से बढ़कर 27 हो गयी है. इनमें से कुछ ऐसे जिले हैं जिनके अस्तित्व में आने के पूर्व उनके पुराने जिले की विषम भौगोलिक सरंचना तथा जिला मुख्यालय तक की लंबी दूरी को देखते हुए नौ जिलो का गठन इस लिहाज से जरुरी हो गया था. राज्य के बहुत से कुछ जिले नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के कारण लोगों को अपने जिला मुख्यालय तक पहुंचना सभंव नही हो पाता था. नए जिले बनने से यह समस्या काफी हद तक हल हो जाएगी.
इस स्थिति को ध्यान में रखते हुये मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने राज्य के सर्वांगीण विकास कि गति को और तेज करने के लिए 9 नये जिलों के गठन का निर्णय लिया। इससे जहाँ शासन प्रशासन और आम जनता एक-दूसरे के नजदीक आयेंगे, जनता और प्रशासन की बीच की दूरी कम होगी । इसका लाभ अंत में जनता को ही मिलेगा.
राज्य सरकार के इस ऐतिहासिक फैसले को अमलीजामा पहनाने के लिए राज्य मंत्रीमंडल से मंजूरी हासिल की गई और 1 जनवरी 2012 से 9 नये जिले अस्तित्व में लाने की अधिसूचना जारी की गई. सभी 9 जिले जनवरी 2012 से अपना प्रशासनिक कामकाज शुरू कर चुके हैं. इस प्रकार राज्य में अब जिलो की संख्या 18 से बढ़कर 27 हो गयी है. एक समय था जब यहॉ सिर्फ 7 जिले हुआ करते थे- रायपुर, राजनांदगांव, दुर्ग बस्तर, बिलासपुर, रायगढ़ और सरगुजा. तब यह छत्तीसगढ़ क्षेत्र अविभाजित मध्यप्रदेश का मात्र एक हिस्सा था. जब 6 जुलाई 1998 को मध्ययप्रदेश में 16 नये जिले बनाये गये तब उनमें से 9 नये जिले इसी अंचल के थें - जिनमें धमतरी, महासंमुद, कवर्धा, दंतेवाड़ा, कोरबा, कांकेर, जांजगीर -चांपा , जशपुर और कोरिया शामिल थे.
नये जिलों के गठन से पहले बहुत सी कठिनाईयां थी जिनके कारण जनता को अपने छोटे से कार्यों के लिए भी बहुत दूर तक नाना होता था. नये जिले अस्तित्व में आने से उन दिक्कतों का काफी हद तक समाधान हो जायेगा। जिस तरह से नए जिलों के लोकार्पण समारोह में जनता क़ा उत्साह उभर कर सामने आ रहा है, उससे यही प्रतीत होता है कि नए जिलों क़ा गठन स्थानीय जनता के लिए किसी त्योंहार से कम नही है.

कोई भी विकास तब तक अधूरा ही माना जायेगा, जब तक जनता उसमे शामिल न हो. इस लिहाज से नए जिले बनने क़ा फैसला छत्तीसगढ़ कि भावी तस्वीर को एक नई चमक और पहचान देने वाला साबित होगा. इस फैसले से ही भविष्य में विकास के नए रास्ते भी खुलेंगे.

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चुनौतियों के बीच बनती विकास की तस्वीर

-- विभाष कुमार झा

राज्य निर्माण के बाद से ही छत्तीसगढ़ ने अनेक क्षेत्रों में शानदार तरक्की की है. इस तरक्की में यहाँ की जनता क़ा योगदान सबसे अहम रहा है. राज्य की सरकारों ने भी अपने हिस्से क़ा कार्य बखूबी किया है. लेकिन अभी छत्तीसगढ़ को अपनी बहुत सी समस्याओं पर कामयाबी हासिल करना बाकी है. खास तौर पर नक्सल समस्या के कारण छत्तीसगढ़ अभी भी आदिवासी बहुल इलाकों में विकास के लिहाज से पिछड़ा हुआ है.
यह सच है कि इन ग्यारह वर्षों में आदिवासी इलाकों में भी विकास के बहुत से कार्य हुए हैं और अब पहले जैसी निराहजनक स्थिति नहीं है. फिर भी वहां और अधिक कार्य तेज गति से किये जाने कि जरुरत है.
राज्य की करीब सवा दो करोड़ आबादी के लिए खुशी और गर्व का विषय है कि छत्तीसगढ़ ने इन ग्यारह वर्षों में पिछडेपन की पहचान में उबरने की प्रबल इच्छा शक्ति दिखाई है. इस दौरान ''अमीर धरती के गरीब लोग'' के मिथक को तोड़ने के लिए समवेत एवं सार्थक प्रयास हुए हैं.
अंतर्राष्ट्रीय मानचित्र में मजबूती से उभरते भारत के साथ लोग अब छत्तीसगढ़ के विकास के प्रति रूचि प्रदर्षित कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ अब विकास की दौड़ में बहुत विकसित राज्यों के समकक्ष आकर खड़ा हो गया है. राज्य में एक ओर औद्योगिक विकास की गति में बढ़ोत्तरी हुई है, वहीं भरपूर कृषि उत्पादन ने किसानों की अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान की है। सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जी.एस.डी.पी.) दर में 11.57 प्रतिशत की उपलब्धि अर्जित कर यह राज्य देश में एक विशेष स्थान हासिल कर चुका है , वहीं धान उत्पादन के क्षेत्र में प्रथम राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करना भी विकास के दावे को मजबूत करता है.
इस नए राज्य ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली, सूचना प्रौद्योगिकी, अधोसंरचना विकास सहित शिक्षा, स्वास्थ्य एवं रोजगार के क्षेत्र में विकास के नए कीर्तिमान स्थापित किये हैं। विकास के इस दौड़ में अनेक बाधाऐं एवं चुनौतियाँ भी सामने है। विरासत में प्राप्त नक्सली समस्या सहित कुछ अन्य समस्याएं भी है। बिजली के क्षेत्र में छत्तीसगढ़ आत्मनिर्भर होने लगा है. विकास क़ा एक और सुखद पहलू यह है कि छत्तीसगढ़ औद्योगिक, कृषि एवं घरेलू उपयोग के लिए चौबीस घंटे बिजली देने वाला देश का पहला राज्य है। प्रदेश में नए औद्योगिक केंद्रो की स्थापना के कारण स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर तेजी से मिल रहे हैं.
प्रदेश ने औद्योगिक उत्पादन के साथ-साथ कृषि उत्पादन में भी शीर्ष प्रगति की है। किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिलने के लिए धान खरीदी की पारदर्शी व्यवस्था की गई है। राज्य की बुनियादी संरचना में तेज गति से विकास हुआ है. साथ ही सड़कों एवं सिंचाई योजना के क्षेत्र में उल्लेखनीय तरक्की हुई है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में स्मार्टकार्ड योजना, बाल हृदय सुरक्षा तथा बाल श्रवण योजना लागू होने से गरीब परिवारों को बेहतर ईलाज की सुविधा मिलने लगी है.
जहाँ तक छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी समस्या क़ा सवाल है तो इसमें नक्सली समस्या ही सबसे ऊपर है- यह सभी जानते हैं. सरकार इसके समाधान के लिए जो भी प्रयास कर रही है, उसमे स्थानीय आदिवासी परिवारों क़ा विश्वास हासिल करना सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए. इसके बिना कोई भी सरकारी प्रयास प्रभावशाली नहीं हो पायेगा. अभी तक के आंकड़ों के अनुसार नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में रोजगार मूलक बहुत सी विकास योजनाए लागू की गई है। शिक्षा और स्वास्थ्य सम्बन्धी कार्यक्रमों तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली को दुरूस्त करने का प्रयास किया गया है।
सरकार के लिए प्रदेश में बढ़ती शराबखोरी भी एक अहम समस्या है. मिफ्त अनाज दिए जाने सम्बन्धी योजना का नकारात्मक प्रभाव शराबखोरी के रूप में मजदूरों और किसानों पर प्रायः हर इलाके में देखा जा रहा था। राज्य सरकार ने समय रहते इन समस्याओं के प्रति तुरंत कदम उठाते हुए किसानों तथा श्रमिकों को शराब की लत से मुक्त रखने के लिए आबकारी नीति में क्रांतिकारी बदलाव लाया है. इसी क़ा नतीजा है कि प्रदेश के 2000 तक कि आबादी वाले गांवों के लगभग ढाई सौ शराब दुकानों को बंद किया गया है। इस वर्ष यह सीमा 3000 आबादी वाले गांवों में भी लागु कर दी गई है. जाहिर है इस निर्णय के कारण ही इस वश आबकारी के राजस्व में कमी आई है, जो कि राज्य के समग्र विकास के लिए एक अच्छा संकेत है.
विकास की इस तस्वीर को देखकर कोई भी छत्तीसगढ़ की उपलब्धियों पर गर्व ही करेगा. हालाँकि किसी भी नए राज्य के लिए एक दशक क़ा समय बहुत अधिक नहीं होता. खास तौर पर तब, जबकि यहाँ नक्सली समस्या विकराल रूप ले चुकी है. इसके बावजूद छत्तीसगढ़ ने विभिन्न क्षेत्रों में जो तरक्की की है, वह प्रेरक है- इसमें कोई दो राय नहीं.
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